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Tuesday, 28 July 2015

तिलक का स्वरुप तथा महत्त्व

हमारे धर्मं चन्दन के तिलक का बहुत महत्व बताया गया है आइये जानते इसके बैज्ञानिक कारण और इसे कैसे लगाया जाता है !!

भगवान को चंदन अर्पण

भगवान को चंदन अर्पण करने का भाव यह है कि हमारा जीवन आपकी कृपा से सुगंध से भर जाए तथा हमारा व्यवहार शीतल रहे यानी हम ठंडे दिमाग से काम करे। अक्सर उत्तेजना में काम बिगड़ता है। चंदन लगाने से उत्तेजना काबू में आती है। चंदन का तिलक ललाट पर या छोटी सी बिंदी के रूप में दोनों भौहों के मध्य लगाया जाता है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से चंदन का तिलक लगाने से दिमाग में शांति, तरावट एवं शीतलता बनी रहती है। मस्तिष्क में सेराटोनिन व बीटाएंडोरफिन नामक रसायनों का संतुलन होता है। मेघाशक्ति बढ़ती है तथा मानसिक थकावट विकार नहीं होता।

मस्तिष्क के भ्रु-मध्य ललाट में जिस स्थान पर टीका या तिलक लगाया जाता है यह भाग आज्ञाचक्र है । शरीर शास्त्र के अनुसार पीनियल ग्रन्थि का स्थान होने की वजह से, जब पीनियल ग्रन्थि को उद्दीप्त किया जाता हैं, तो मस्तष्क के अन्दर एक तरह के प्रकाश की अनुभूति होती है । इसे प्रयोगों द्वारा प्रमाणित किया जा चुका है हमारे ऋषिगण इस बात को भलीभाँति जानते थे पीनियल ग्रन्थि के उद्दीपन से आज्ञाचक्र का उद्दीपन होगा । इसी वजह से धार्मिक कर्मकाण्ड, पूजा-उपासना व शूभकार्यो में टीका लगाने का प्रचलन से बार-बार उस के उद्दीपन से हमारे शरीर में स्थूल-सूक्ष्म अवयन जागृत हो सकें ।

तिलक का महत्व

हिन्दु परम्परा में मस्तक पर तिलक लगाना शूभ माना जाता है इसे सात्विकता का प्रतीक माना जाता है विजयश्री प्राप्त करने के उद्देश्य रोली, हल्दी, चन्दन या फिर कुम्कुम का तिलक महत्ता को ध्यान में रखकर, इसी प्रकार शुभकामनाओं के रुप में हमारे तीर्थस्थानों पर, विभिन्न पर्वो-त्यौहारों, विशेष अतिथि आगमन पर आवाजाही के उद्द्ेश्य से भी लगाया जाता है ।

चन्दन लगाने के प्रकार

स्नान एवं धौत वस्त्र धारण करने के उपरान्त वैष्णव ललाट पर ऊर्ध्वपुण्ड्र, शैव त्रिपुण्ड, गाणपत्य रोली या सिन्दूर का तिलक शाक्त एवं जैन क्रमशः लाल और केसरिया बिन्दु लगाते हैं। धार्मिक तिलक स्वयं के द्वारा लगाया जाता है, जबकि सांस्कृतिक तिलक दूसरा लगाता है।

नारद पुराण में उल्लेख आया है-
१. ब्राह्मण को ऊर्ध्वपुण्ड्र,
२. क्षत्रिय को त्रिपुण्ड,
३. वैश्य को अर्धचन्द्र,
४. शुद्र को वर्तुलाकार चन्दन से ललाट को अंकित करना चाहिये।

योगी सन्यासी ऋषि साधकों तथा इस विषय से सम्बन्धित ग्रन्थों के अनुसार भृकुटि के मध्य भाग देदीप्यमान है।

१.ऊर्ध्वपुण्ड्र चन्दन - वैष्णव सम्प्रदायों का कलात्मक भाल तिलक ऊर्ध्वपुण्ड्र कहलाता है। चन्दन, गोपीचन्दन, हरिचन्दन या रोली से भृकुटि के मध्य में नासाग्र या नासामूल से ललाट पर केश पर्यन्त अंकित खड़ी दो रेखाएं ऊर्ध्वपुण्ड्र कही जाती हैं। |

वैष्णव ऊर्ध्वपुण्ड्र के विषय में पुराणों में दो प्रकार की मान्यताएं मिलती हैं।

नारद पुराण में - इसे विष्णु की गदा का द्योतक माना गया है.

ऊर्ध्वपुण्ड्रोपनिषद में - ऊर्ध्वपुण्ड्र को विष्णु के चरण पाद का प्रतीक बताकर विस्तार से इसकी व्याख्या की है। |

पुराणों में - ऊर्ध्वपुण्ड्र की दक्षिण रेखा को विष्णु अवतार राम या कृष्ण के "दक्षिण चरण तल" का प्रतिबिम्ब माना गया है, जिसमें वज्र, अंकुश, अंबर, कमल, यव, अष्टकोण, ध्वजा, चक्र, स्वास्तिक तथा ऊर्ध्वरेख है.

तथा ऊर्ध्वपुण्ड्र की बायीं केश पर्यन्त रेखा विष्णु का "बायाँ चरण तल" है जो गोपद, शंख, जम्बूफल, कलश, सुधाकुण्ड, अर्धचन्द्र, षटकोण, मीन, बिन्दु, त्रिकोण तथा इन्द्रधनुष के मंगलकारी चिन्हों से युक्त है।

इन मंगलकारी चिन्हों के धारण करने से वज्र से - बल तथा पाप संहार, अंकुश से - मनानिग्रह, अम्बर से - भय विनाश, कमल से - भक्ति, अष्टकोण से - अष्टसिद्धि, ध्वजा से - ऊर्ध्व गति, चक्र से - शत्रुदमन, स्वास्तिक से- कल्याण, ऊर्ध्वरेखा से - भवसागर तरण, पुरूष से - शक्ति और सात्त्विक गुणों की प्राप्ति, गोपद से - भक्ति, शंख से - विजय और बुद्धि से - पुरूषार्थ, त्रिकोण से - योग्य, अर्धचन्द्र से - शक्ति, इन्द्रधनुष से - मृत्यु भय निवारण होता है।

2. त्रिपुण्ड चन्दन - विष्णु उपासक वैष्णवों के समान ही शिव उपासक ललाट पर भस्म या केसर युक्त चन्दन द्वारा भौहों के मध्य भाग से लेकर जहाँ तक भौहों का अन्त है उतना बड़ा त्रिपुण्ड और ठीक नाक के ऊपर लाल रोली का बिन्दु या तिलक धारण करते हैं। मध्यमा, अनामिका और तर्जनी से तीन रेखाएँ तथा बीच में रोली का अंगुष्ठ द्वारा प्रतिलोम भाव से की गई रेखा त्रिपुण्ड कहलाती है।

शिवपुराण में त्रिपुण्ड को योग और मोक्ष दायक बताया गया है। शिव साहित्य में त्रिपुण्ड की तीन रेखाओं के नौ-नौ के क्रम में सत्ताईस देवता बताए गये हैं। वैष्णव द्वादय तिलक के समान ही त्रिपुण्ड धारण करने के लिये बत्तीस या सोलह अथवा शरीर के आठ अंगों में लगाने का आदेश है तथा स्थानों एवं अवयवों के देवों का अलग-अलग विवेचन किया गया है। शैव ग्रन्थों में विधिवत त्रिपुण्ड धारण कर रूद्राक्ष से महामृत्युजंय का जप करने वाले साधक के दर्शन को साक्षात रूद्र के दर्शन का फल बताया गया है।

अप्रकाशिता उपनिषद के बहिवत्रयं तच्च जगत् त्रय, तच्च शक्तित्रर्य स्यात् द्वारा तीन अग्नि, तीन जगत और तीन शक्ति ज्ञान इच्छा और क्रिया का द्योतक बताकर कहा है कि जिसने त्रिपुण्ड धारण कर रखा है, उसे देवात् कोई देख ले तो वह सभी बाधाओं से विमुक्त हो जाता है। त्रिपुण्ड के बीच लाल तिलक या बिन्दु कारण तत्त्व बिन्दु माना जाता है। गणेश भक्त गाणपत्य अपनी भुजाओं पर गणेश के एक दाँत की तप्त मुद्रा दागते हैं तथा गणपति मुख की छाप लगाकर मस्तक पर लाल रोली या सिन्दूर का तिलक धारण कर गजवदन की उपासना करते हैं।

चन्दन के प्रकार

१. हरि चन्दन - पद्मपुराण के अनुसार तुलसी के काष्ठ को घिसकर उसमें कपूर, अररू या केसर के मिलाने से हरिचन्दन बनता है।

२. गोपीचन्दन- गोपीचन्दन द्वारका के पास स्थित गोपी सरोवर की रज है, जिसे वैष्णवों में परम पवित्र माना जाता है। स्कन्द पुराण में उल्लेख आया है कि श्रीकृष्ण ने गोपियों की भक्ति से प्रभावित होकर द्वारका में गोपी सरोवर का निर्माण किया था, जिसमें स्नान करने से उनको सुन्दर का सदा सर्वदा के लिये स्नेह प्राप्त हुआ था। इसी भाव से अनुप्रेरित होकर वैष्णवों में गोपी चन्दन का ऊर्ध्वपुण्ड्र मस्तक पर लगाया जाता है।

इसी पुराण के पाताल खण्ड में कहा गया है कि गोपीचन्दन का तिलक धारण करने मात्र से ब्राह्मण से लेकर चांडाल तक पवित्र हो जाता है। जिसे वैष्णव सम्प्रदाय में गोपी चन्दन के समान पवित्र माना गया है.

स्कन्दपुराण में गोमती, गोकुल और गोपीचन्दन को पवित्र और दुर्लभ बताया गया है तथा कहा गया है कि जिसके घर में गोपीचन्दन की मृत्तिका विराजमान हैं, वहाँ श्रीकृष्ण सहित द्वारिकापुरी स्थित है।

सामान्य तिलक का आकार

धार्मिक तिलक के समान ही हमारे पारिवारिक या सामाजिक चर्या में तिलक इतना समाया हुआ है कि इसके अभाव में हमारा कोई भी मंगलमय कार्य हो ही नहीं सकता। इसका रूप या आकार दीपक की ज्याति, बाँस की पत्ती, कमल, कली, मछली या शंख के समान होना चाहिए। धर्म शास्त्र के ग्रन्थों के अनुसार इसका आकार दो से दस अंगुल तक हो सकता है। तिलक से पूर्व ‘श्री’ स्वरूपा बिन्दी लगानी चाहिये उसके पश्चात् अंगुठे से विलोम भाव से तिलक लगाने का विधान है। अंगुठा दो बार फेरा जाता है।

किस उँगली से लगाना चाहिये

ब्रह्माण्ड पुराण के अनुसार तिलक में "अंगुठे के प्रयोग से - शक्ति, मध्यमा के प्रयोग से - दीर्घायु, अनामिका के प्रयोग से- समृद्धि तथा तर्जनी से लगाने पर - मुक्ति प्राप्त होती है" तिलक विज्ञान विषयक समस्त ग्रन्थ तिलक अंकन में नाखून स्पर्श तथा लगे तिलक को पौंछना अनिष्टकारी बतलाते हैं।

देवताओं पर केवल अनामिका से तिलक बिन्दु लगाया जाता है। तिलक की विधि सांस्कृतिक सौन्दर्य सहित जीवन की मंगल दृष्टि को मनुष्य के सर्वाधिक मूल्यवान् तथा ज्ञान विज्ञान के प्रमुख केन्द्र मस्तक पर अंकित करती है।

तिलक के मध्य में चावल

तिलक के मध्य में चावल लगाये जाते हैं। तिलक के चावल शिव के परिचायक हैं। शिव कल्याण के देवता हैं जिनका वर्ण शुक्ल है। लाल तिलक पर सफेद चावल धारण कर हम जीवन में शिव व शक्ति के साम्य का आशीर्वाद ग्रहण करते हैं। इच्छा और क्रिया के साथ ज्ञान का समावेश हो। सफेद गोपी चन्दन तथा लाल बिन्दु इसी सत्य के साम्य का सूचक है।

दुर्गा

दुर्गा >>>

दुर्गा दैत्ये महाविघ्ने भवबन्धे कुकर्मणि ।
शोके दुःखे च नरके यम दण्डे च जन्मनि ।।
महाभये रोगे च शब्दोऽयं हन्तृवाचकः ।

--> राक्षसी भय मेँ , सांसारिक मोहमाया मेँ , कुत्सित कर्म मेँ शोक ,दुःख , नरक , यमराज द्वारा निर्धारित दण्ड मेँ , जन्म ,मरण , महाभय मेँ तथा रोगो मेँ दुर्गा शब्द के स्मरण मात्र से मुक्ति मिल जाती है ।

द - दैत्य नाशार्थ वचनोँदकारः परिकीर्तितः ,
उ - उकारो विघ्ननाशस्य वाचको वेद सम्मतः ,
रः -रेफो रोगन्ध वचनोँ ,
ग - गश्च पापन्धः वाचकः
आ - भय शत्रुघ्न वचनश्चाकारः परिकीर्तितः ।

द -> दैत्यो का नाश करना ।
उ -> विघ्नो का नाश करने वाला ।
रः -> रोंगो का नाश करने वाला ।
ग -> पापो का नाश करने वाला ।
अ -> भय और शत्रुओँ का नाश करने वाले पञ्चाक्षर अलग अलग कार्यो को करते हैँ ।

इनके सम्मेलन से ही " दुर्गा " शब्द बना है ।
अतः हर प्रकार के क्लेशोँ को नाश करने वाला तथा सकल सुख सम्पत्ति प्रदान करने वाला यह नाम विश्व के प्राणियोँ का कल्याण करने वाला है ।
दुर्गा तो जगत माता हैँ ।

" पुत्र कुपुत्र जायते माता कुमाता न भवति । "
अतः माँ अपने पुत्रो का सदैव कल्याण ही करती है ।।

जगतजननी पराम्बा माँ दुर्गा की जय !!!

शिवलिंग

शिवलिंग का मतलब (Meaning of
Shivling)..... कुछ मूर्ख और कुढ़मगज किस्म के
प्राणियों ने ….. परम पवित्र शिवलिंग को
जननांग समझ कर ….. पता नही क्या-क्या और
कपोल कल्पित अवधारणाएं फैला रखी हैं
क्या आप जानते हैं कि ……. शिवलिंग का
मतलब क्या होता है … और, शिवलिंग किस
चीज का प्रतिनिधित्व करता है……??????
शिवलिंग ………. वातावरण सहित घूमती
धरती तथा …… सारे अनन्त ब्रह्माण्ड
( क्योंकि, ब्रह्माण्ड गतिमान है ) का अक्स/
धुरी (axis) ही लिंग है।
The whole universe rotates
through a shaft called …….. shiva
lingam.
दरअसल……. ये गलतफहमी….. भाषा के
रूपांतरण ….. और, मलेच्छों द्वारा हमारे
पुरातन धर्म ग्रंथों को नष्ट कर दिए जाने …..
तथा, अंग्रेजों द्वारा इसकी व्याख्या से
उत्पन्न हुआ ….. हो सकता है…!
खैर…..
जैसा कि…. हम सभी जानते है कि….. एक ही
शब्द के .. विभिन्न भाषाओँ में …… अलग-अलग
अर्थ निकलते हैं….!
उदाहरण के लिए………
यदि हम हिंदी के एक शब्द “”सूत्र”’ को ही ले
लें तो…….
सूत्र मतलब……… डोरी/
धागा……..गणितीय सूत्र……….कोई
भाष्य……… अथवा लेखन भी हो सकता है….
जैसे कि…. नासदीय सूत्र……ब्रह्म सूत्र
इत्यादि….!
उसी प्रकार….. “”अर्थ”” शब्द का भावार्थ
………… : सम्पति भी हो सकता है….. और….
मतलब (मीनिंग) भी….!
ठीक बिल्कुल उसी प्रकार……… शिवलिंग के
सन्दर्भ में………. लिंग शब्द से अभिप्राय
……………… चिह्न, निशानी, गुण, व्यवहार
या प्रतीक है।
ध्यान देने योग्य बात है
कि………..””लिंग”” एक संस्कृत का शब्द
है………
जिसके निम्न अर्थ है :
@@@@त आकाशे न विधन्ते -वै०। अ ० २
। आ ० १ । सू ० ५
अर्थात….. रूप, रस, गंध और स्पर्श ……..ये
लक्षण आकाश में नही है ….. किन्तु शब्द ही
आकाश का गुण है ।
@@@@निष्क्रमणम् प्रवेशनमित्याकश
स्य लिंगम् -वै०। अ ० २ । आ ० १ । सू ० २
०
अर्थात….. जिसमे प्रवेश करना व् निकलना
होता है ….वह आकाश का लिंग है …….
अर्थात ये आकाश के गुण है ।
@@@@अपरस्मिन्नपरं युगपच्चिरं
क्षिप्रमिति काललिङ्गानि । -वै०। अ ० २
। आ ० २ । सू ० ६
अर्थात….. जिसमे अपर, पर, (युगपत) एक वर,
(चिरम) विलम्ब, क्षिप्रम शीघ्र इत्यादि
प्रयोग होते है, इसे काल कहते है, और ये ….
काल के लिंग है ।
@@@@इत इदमिति यतस्यद्दिश्यं लिंगम
। -वै०। अ ० २ । आ ० २ । सू ० १ ०
अर्थात……. जिसमे पूर्व, पश्चिम, उत्तर,
दक्षिण, ऊपर व् नीचे का व्यवहार होता है
….उसी को दिशा कहते है……. मतलब कि….ये
सभी दिशा के लिंग है ।
@@@@इच्छाद्वेषप्रयत
्नसुखदुःखज्ञाना न्यात्मनो लिंगमिति -
न्याय० अ ० १ । आ ० १ । सू ० १ ०
अर्थात….. जिसमे (इच्छा) राग, (द्वेष) वैर,
(प्रयत्न) पुरुषार्थ, सुख, दुःख, (ज्ञान) जानना
आदि गुण हो, वो जीवात्मा है…… और, ये सभी
जीवात्मा के लिंग अर्थात कर्म व् गुण है ।
इसीलिए……… शून्य, आकाश, अनन्त,
ब्रह्माण्ड और निराकार परमपुरुष का प्रतीक
होने के कारन………. इसे लिंग कहा गया है…।
स्कन्दपुराण में स्पष्ट कहा है कि……. आकाश
स्वयं लिंग है…… एवं , धरती उसका पीठ या
आधार है …..और , ब्रह्माण्ड का हर चीज …….
अनन्त शून्य से पैदा होकर….. अंततः…. उसी में
लय होने के कारण इसे लिंग कहा है ………
यही कारन है कि…… इसे कई अन्य नामो से
भी संबोधित किया गया है ……..जैसे कि …..:
प्रकाश स्तंभ/लिंग, अग्नि स्तंभ/लिंग, उर्जा
स्तंभ/लिंग, ब्रह्माण्डीय स्तंभ/लिंग
(cosmic pillar/lingam) … इत्यादि…!
यहाँ यह ध्यान देने योग्य बात है कि…..
इस ब्रह्माण्ड में दो ही चीजे है : ऊर्जा और
प्रदार्थ……..!
इसमें से……. हमारा शरीर प्रदार्थ से
निर्मित है …….. जबकि आत्मा एक ऊर्जा
है…….|
ठीक इसी प्रकार…… शिव पदार्थ और शक्ति
ऊर्जा का प्रतीक बन कर……… शिवलिंग
कहलाते हैं |
क्योंकि…. ब्रह्मांड में उपस्थित समस्त ठोस
तथा उर्जा शिवलिंग में निहित है………!
अगर इसे धार्मिक अथवा आध्यात्म की दृष्टि से
बोलने की जगह … शुद्ध वैज्ञानिक भाषा में
बोला जाए तो….. ….. हम कह सकते हैं कि…..
शिवलिंग…. और कुछ नहीं बल्कि….. हमारे
ब्रह्मांड की आकृति है. (The universe is
a sign of Shiva Lingam.)
और…. अगर इसे धार्मिक अथवा आध्यात्म की
भाषा में बोला जाए तो….. शिवलिंग ………
भगवान शिव और देवी शक्ति (पार्वती) का
आदि-अनादि एकल रूप है तथा पुरुष और प्रकृति
की समानता का प्रतीक है….!
अर्थात…….. शिवलिंग हमें बताता है कि……
इस संसार में न केवल पुरुष का….. और न ही
केवल प्रकृति (स्त्री) का वर्चस्व है ……..
बल्कि, दोनों एक दूसरे के पूरक हैं और दोनों ही
समान हैं..!
शिवलिंग की पूजा को ठीक से समझने के लिए
……
आप जरा आईसटीन का वो सूत्र याद करें……
जिसके आधार पर उसने परमाणु बम बनाया
था….!
क्योंकि…. उस सूत्र ने ही …..परमाणु के अन्दर
छिपी अनंत ऊर्जा की एक झलक दिखाई ……
जो कितनी विध्वंसक थी….. ये सर्वविदित है
|
और… परमाणु बम का वो सूत्र था…..
e / c = m c {e=mc^2}
अब ध्यान दें कि …. ये सूत्र एक सिद्धांत है ….
जिसके अनुसार पदार्थ को पूर्णतया ऊर्जा में
बदला जा सकता है …..अर्थात, अर्थात…..
पदार्थ और उर्जा … दो अलग-अलग चीज
नहीं… बल्कि , एक ही चीज हैं….. परन्तु…. वे
दो अलग-अलग चीज बनकर ही सृष्टि का
निर्माण करते हैं….!
और….. जिस बात तो आईसटीन ने अभी बताया
….. उस रहस्य को तो …हमारे ऋषियो ने
हजारो-लाखों साल पहले ही ख़ोज लिया था.
यह सर्वविदित है कि….. हमारे संतों/ऋषियों
ने हमें वेदों और उपनिषदों का ज्ञान लिखित
रूप में प्रदान किया है … परन्तु, उन्होंने कभी
यह दावा नहीं किया कि यह उनका काम है..
बल्कि, उन्होंने हर काम के अंत में स्वीकार
किया कि……. वे हमें वही बता रहे हैं…. जो,
उन्हें अपने पूर्वजों द्वारा कहा गया है.
और….लगभग १३.७ खरब वर्ष पुराना ….
सार्वभौमिक ज्ञान हमें तमिल और संस्कृत जैसी
महान भाषाओँ में उपलब्ध होता है….. और,
भावार्थ बदल जाने के कारण… इसे किसी अन्य
भाषा में पूर्णतया (exact) अनुवाद नही
किया जा सकता …. कम से कम अंग्रेजी जैसी
कमजोर भाषा में तो बिलकुल नही ।
इसके लिए…. एक बहुत ही छोटा सा उदाहरण
देना ही पर्याप्त होगा कि….. आज “”गूगल
ट्रांसलेटर”” में ……लगभग सभी भाषाओँ का
समावेश है …..परन्तु… संस्कृत का नही …
क्योकि संस्कृत का व्याकरण विशाल तथा
दुर्लभ है …!
अति मूर्ख प्राणी नासा वाली बात का सबूत
यहाँ देख सकते हैं…. : http://
hindi.ibtl.in/ news/
international/ 1978/ article.ibtl
हुआ दरअसल कुछ ऐसा है कि……….. जब
कालांतर में ज्ञान के स्तर में गिरावट आई तब
पाश्चात्य वैज्ञानिको ने वेदों / उपनिषदों
तथा पुराणो आदि को समझने में मूर्खता की …
क्योकि, उनकी बुद्धिमत्ता वेदों में निहित
प्रकाश से साक्षात्कार करने योग्य नही थी ।
और…. ऐसा उदहारण तो हम हमारे दैनिक
जीवन में भी हमेशा देखते ही रहते हैं कि….देखते
है जैसे परीक्षा के दिनों में अध्ययन करते समय
जब कोई टॉपिक हमें समझ न आये तो हम कह
दिया करते है कि ये टॉपिक तो बेकार है
…..जबकि, असल में वह टॉपिक बेकार नही….
अपितु , उस टॉपिक में निहित ज्ञान का
प्रकाश हमारी बुद्धिमत्ता से अधिक है ।
इसे ज्यादा सरल भाषा में ….इस तरह भी समझ
सकते है कि,….. बैटरी चालित 12 वोल्ट
धारण कर सकने वाले विद्युत् बल्ब में.., अगर
घरों में आने वाले वोल्ट (240) प्रवाहित कर
दिया जाये तो उस बल्ब की क्या दुर्गति
होगी ??????
जाहिर सी बात है कि…. उसका फिलामेंट
तत्क्षण अविलम्ब उड़ जायेगा ।
यही उन बेचारे वैज्ञानिकों के साथ हुआ … और,
वेद जैसे गूढ़ ग्रन्थ पढ़कर …. उनका भी
फिलामेंट उड़ गया और….. मैक्स मूलर जैसे गधे के
औलदॊन तो ….. वेदों को काल्पनिक तक बता
दिया !
खैर….. हम फिर शिवलिंग पर आते हैं…..
शिवलिंग का प्रकृति में बनना.. हम अपने दैनिक
जीवन में भी देख सकते है जब कि ……
किसी स्थान पर अकस्मात् उर्जा का उत्सर्जन
होता है …..तो , उर्जा का फैलाव अपने मूल
स्थान के चारों ओर एक वृताकार पथ में तथा
उपर व नीचे की ओर अग्रसर होता है अर्थात
दशोदिशाओं (आठों दिशों की प्रत्येक डिग्री
(360 डिग्री)+ऊपर व नीचे ) होता है..
जिसके फलस्वरूप एक क्षणिक शिवलिंग आकृति
की प्राप्ति होती है
उसी प्रकार…. बम विस्फोट से प्राप्त उर्जा
का प्रतिरूप… एवं, शांत जल में कंकर फेंकने पर
प्राप्त तरंग (उर्जा) का प्रतिरूप …. भी
शिवलिंग का निर्माण करते हैं….!
दरअसल…. सृष्टि के आरम्भ में महाविस्फोट के
पश्चात् उर्जा का प्रवाह वृत्ताकार पथ में
तथा ऊपर व नीचे की ओर हुआ फलस्वरूप एक
महाशिवलिंग का प्राकट्य हुआ….. जिसका
वर्णन हमें लिंगपुराण, शिवमहापुराण, स्कन्द
पुराण आदि में इस प्रकार मिलता है कि ……..
आरम्भ में निर्मित शिवलिंग इतना विशाल
(अनंत) तथा की देवता आदि मिल कर भी उस
लिंग के आदि और अंत का छोर या शाश्वत अंत न
पा सके ।
हमारे पुराणो में कहा गया है कि…… प्रत्येक
महायुग के पश्चात समस्त संसार….. इसी
शिवलिंग में समाहित (लय) होता है तथा इसी
से पुनः सृजन होता है ।
इस तरह……….. सामान्य भाषा में कहा जाए
तो….उसी आदि शक्ति के आदि स्वरुप
(शिवलिंग ) से इस समस्त संसार की उत्पति हुई
तथा उसका यह गोलाकार/ सर्पिलाकार
स्वरुप प्रत्यक्ष अथवा प्ररोक्ष तथा
प्राकृतिक अथवा कृत्रिम रूप से हमारे चारों
और स्थित है ….
और, शिवलिंग का प्रतिरूप ब्रह्माण्ड के हर
जगह मौजूद है…. जैसे कि….
1. हमारी आकाश गंगा , हमारी पडोसी अन्य
आकाश गंगाएँ (पांच -सात -दस नही, अनंत है) ,
ग्रहों, उल्काओं आदि की गति (पथ), ब्लैक होल
की रचना , संपूर्ण पृथ्वी पर पाए गये
सर्पिलाकार चिन्ह ( जो अभी तक रहस्य बने
हए है.. और, हजारों की संख्या में है.. तथा ,
जिनमे से अधिकतर पिरामिडों से भी पुराने है
। ), समुद्री तूफान , मानव डीएनए, परमाणु
की संरचना … इत्यादि…!
इसीलिए तो…. शिव को शाश्वत एवं….
अनादी, अनत….. निरंतर भी कहा जाता है….!

शक्ति पीठ

* * * *शक्ति पीठ : * * * *
देवी भागवत पुराण में 108, कालिकापुराण में
छब्बीस, शिवचरित्र में इक्यावन, दुर्गा शप्तसती और
तंत्र चूड़ामणि में शक्ति पीठों की संख्या 52 बताई
गई है।
साधारत: 51 शक्ति पीठ माने जाते हैं।
तंत्रचूड़ामणि में लगभग 52 शक्ति पीठों के बारे में
बताया गया है।
प्रस्तुत है तंत्रचूड़ामणि की तालिका।
1.हिंगलाज
हिंगुला या हिंगलाज शक्तिपीठ जो कराची से 125
किमी उत्तर पूर्व में स्थित है, जहाँ माता का
ब्रह्मरंध (सिर) गिरा था। इसकी शक्ति- कोटरी
(भैरवी-कोट्टवीशा) है और भैरव को भीमलोचन कहते
हैं।
2.शर्कररे (करवीर)
पाकिस्तान में कराची के सुक्कर स्टेशन के निकट
स्थित है शर्कररे शक्तिपीठ, जहाँ माता की आँख
गिरी थी। इसकी शक्ति- महिषासुरमर्दिनी और
भैरव को क्रोधिश कहते हैं।
3.सुगंधा- सुनंदा
बांग्लादेश के शिकारपुर में बरिसल से 20 किमी दूर
सोंध नदी के किनारे स्थित है माँ सुगंध, जहाँ माता
की नासिका गिरी थी। इसकी शक्ति है सुनंदा और
भैरव को त्र्यंबक कहते हैं।
4.कश्मीर- महामाया
भारत के कश्मीर में पहलगाँव के निकट माता का कंठ
गिरा था। इसकी शक्ति है महामाया और भैरव को
त्रिसंध्येश्वर कहते हैं।
5.ज्वालामुखी- सिद्धिदा (अंबिका)
भारत के हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा में माता की
जीभ गिरी थी, उसे ज्वालाजी स्थान कहते हैं।
इसकी शक्ति है सिद्धिदा (अंबिका) और भैरव को
उन्मत्त कहते हैं।
6.जालंधर- त्रिपुरमालिनी
पंजाब के जालंधर में छावनी स्टेशन के निकट देवी
तलाब जहाँ माता का बायाँ वक्ष (स्तन) गिरा
था। इसकी शक्ति है त्रिपुरमालिनी और भैरव को
भीषण कहते हैं।
7.वैद्यनाथ- जयदुर्गा
झारखंड के देवघर में स्थित वैद्यनाथधाम जहाँ माता
का हृदय गिरा था। इसकी शक्ति है जय दुर्गा और
भैरव को वैद्यनाथ कहते हैं।
8.नेपाल- महामाया
नेपाल में पशुपतिनाथ मंदिर के निकट स्थित है
गुजरेश्वरी मंदिर जहाँ माता के दोनों घुटने (जानु)
गिरे थे। इसकी शक्ति है महशिरा (महामाया) और
भैरव को कपाली कहते हैं।
9.मानस- दाक्षायणी
तिब्बत स्थित कैलाश मानसरोवर के मानसा के
निकट एक पाषाण शिला पर माता का दायाँ हाथ
गिरा था। इसकी शक्ति है दाक्षायनी और भैरव
अमर हैं।
10.विरजा- विरजाक्षेत्र
भारतीय प्रदेश उड़ीसा के विराज में उत्कल स्थित
जगह पर माता की नाभि गिरी थी। इसकी शक्ति
है विमला और भैरव को जगन्नाथ कहते हैं।
11.गंडकी- गंडकी
नेपाल में गंडकी नदी के तट पर पोखरा नामक स्थान
पर स्थित मुक्तिनाथ मंदिर, जहाँ माता का मस्तक
या गंडस्थल अर्थात कनपटी गिरी थी। इसकी शक्ति
है गण्डकी चण्डी और भैरव चक्रपाणि हैं।
12.बहुला- बहुला (चंडिका)
भारतीय प्रदेश पश्चिम बंगाल से वर्धमान जिला से 8
किमी दूर कटुआ केतुग्राम के निकट अजेय नदी तट पर
स्थित बाहुल स्थान पर माता का बायाँ हाथ गिरा
था। इसकी शक्ति है देवी बाहुला और भैरव को
भीरुक कहते हैं।
13.उज्जयिनी- मांगल्य चंडिका
भारतीय प्रदेश पश्चिम बंगाल में वर्धमान जिले से 16
किमी गुस्कुर स्टेशन से उज्जयिनी नामक स्थान पर
माता की दायीं कलाई गिरी थी। इसकी शक्ति है
मंगल चंद्रिका और भैरव को कपिलांबर कहते हैं।
14.त्रिपुरा- त्रिपुर सुंदरी
भारतीय राज्य त्रिपुरा के उदरपुर के निकट
राधाकिशोरपुर गाँव के माताबाढ़ी पर्वत शिखर पर
माता का दायाँ पैर गिरा था। इसकी शक्ति है
त्रिपुर सुंदरी और भैरव को त्रिपुरेश कहते हैं।
15.चट्टल – भवानी
बांग्लादेश में चिट्टागौंग (चटगाँव) जिला के
सीताकुंड स्टेशन के निकट चंद्रनाथ पर्वत शिखर पर
छत्राल (चट्टल या चहल) में माता की दायीं भुजा
गिरी थी। इसकी शक्ति भवानी है और भैरव को
चंद्रशेखर कहते हैं।
16.त्रिस्रोता- भ्रामरी
भारतीय राज्य पश्चिम बंगाल के जलपाइगुड़ी के
बोडा मंडल के सालबाढ़ी ग्राम स्थित त्रिस्रोत
स्थान पर माता का बायाँ पैर गिरा था। इसकी
शक्ति है भ्रामरी और भैरव को अंबर और भैरवेश्वर कहते
हैं।
17.कामगिरि- कामाख्या
भारतीय राज्य असम के गुवाहाटी जिले के
कामगिरि क्षेत्र में स्थित नीलांचल पर्वत के
कामाख्या स्थान पर माता का योनि भाग गिरा
था। इसकी शक्ति है कामाख्या और भैरव को
उमानंद कहते हैं।
18.प्रयाग- ललिता
भारतीय राज्य उत्तरप्रदेश के इलाहबाद शहर (प्रयाग)
के संगम तट पर माता की हाथ की अँगुली गिरी थी।
इसकी शक्ति है ललिता और भैरव को भव कहते हैं।
19.जयंती- जयंती
बांग्लादेश के सिल्हैट जिले के जयंतीया परगना के
भोरभोग गाँव कालाजोर के खासी पर्वत पर जयंती
मंदिर जहाँ माता की बायीं जंघा गिरी थी।
इसकी शक्ति है जयंती और भैरव को क्रमदीश्वर कहते
हैं।
20.युगाद्या- भूतधात्री
पश्चिम बंगाल के वर्धमान जिले के खीरग्राम स्थित
जुगाड्या (युगाद्या) स्थान पर माता के दाएँ पैर का
अँगूठा गिरा था। इसकी शक्ति है भूतधात्री और
भैरव को क्षीर खंडक कहते हैं।
21.कालीपीठ- कालिका
कोलकाता के कालीघाट में माता के बाएँ पैर का
अँगूठा गिरा था। इसकी शक्ति है कालिका और
भैरव को नकुशील कहते हैं।
22.किरीट- विमला (भुवनेशी)
पश्चिम बंगाल के मुर्शीदाबाद जिला के लालबाग
कोर्ट रोड स्टेशन के किरीटकोण ग्राम के पास
माता का मुकुट गिरा था। इसकी शक्ति है विमला
और भैरव को संवर्त्त कहते हैं।
23.वाराणसी- विशालाक्षी
उत्तरप्रदेश के काशी में मणिकर्णिक घाट पर माता
के कान के मणिजड़ीत कुंडल गिरे थे। इसकी शक्ति है
विशालाक्षी मणिकर्णी और भैरव को काल भैरव
कहते हैं।
24.कन्याश्रम- सर्वाणी
कन्याश्रम में माता का पृष्ठ भाग गिरा था। इसकी
शक्ति है सर्वाणी और भैरव को निमिष कहते हैं।
25.कुरुक्षेत्र- सावित्री
हरियाणा के कुरुक्षेत्र में माता की एड़ी (गुल्फ)
गिरी थी। इसकी शक्ति है सावित्री और भैरव है
स्थाणु।
26.मणिदेविक- गायत्री
अजमेर के निकट पुष्कर के मणिबन्ध स्थान के गायत्री
पर्वत पर दो मणिबंध गिरे थे। इसकी शक्ति है गायत्री
और भैरव को सर्वानंद कहते हैं।
27.श्रीशैल- महालक्ष्मी
बांग्लादेश के सिल्हैट जिले के उत्तर-पूर्व में जैनपुर गाँव
के पास शैल नामक स्थान पर माता का गला
(ग्रीवा) गिरा था। इसकी शक्ति है महालक्ष्मी
और भैरव को शम्बरानंद कहते हैं।
28.कांची- देवगर्भा
पश्चिम बंगाल के बीरभुम जिला के बोलारपुर स्टेशन
के उत्तर पूर्व स्थित कोपई नदी तट पर कांची नामक
स्थान पर माता की अस्थि गिरी थी। इसकी
शक्ति है देवगर्भा और भैरव को रुरु कहते हैं।
29.कालमाधव- देवी काली
मध्यप्रदेश के अमरकंटक के कालमाधव स्थित शोन नदी
तट के पास माता का बायाँ नितंब गिरा था जहाँ
एक गुफा है। इसकी शक्ति है काली और भैरव को
असितांग कहते हैं।
30.शोणदेश- नर्मदा (शोणाक्षी)
मध्यप्रदेश के अमरकंटक स्थित नर्मदा के उद्गम पर
शोणदेश स्थान पर माता का दायाँ नितंब गिरा
था। इसकी शक्ति है नर्मदा और भैरव को भद्रसेन कहते
हैं।
31.रामगिरि- शिवानी
उत्तरप्रदेश के झाँसी-मणिकपुर रेलवे स्टेशन चित्रकूट के
पास रामगिरि स्थान पर माता का दायाँ वक्ष
गिरा था। इसकी शक्ति है शिवानी और भैरव को
चंड कहते हैं।
32.वृंदावन- उमा
उत्तरप्रदेश के मथुरा के निकट वृंदावन के भूतेश्वर स्थान
पर माता के गुच्छ और चूड़ामणि गिरे थे। इसकी
शक्ति है उमा और भैरव को भूतेश कहते हैं।
33.शुचि- नारायणी
तमिलनाडु के कन्याकुमारी-तिरुवनंतपुरम मार्ग पर
शुचितीर्थम शिव मंदिर है, जहाँ पर माता की ऊपरी
दंत (ऊर्ध्वदंत) गिरे थे। इसकी शक्ति है नारायणी और
भैरव को संहार कहते हैं।
34.पंचसागर- वाराही
पंचसागर (अज्ञात स्थान) में माता की निचले दंत
(अधोदंत) गिरे थे। इसकी शक्ति है वराही और भैरव
को महारुद्र कहते हैं।
35.करतोयातट- अपर्णा
बांग्लादेश के शेरपुर बागुरा स्टेशन से 28 किमी दूर
भवानीपुर गाँव के पार करतोया तट स्थान पर माता
की पायल (तल्प) गिरी थी। इसकी शक्ति है अर्पण
और भैरव को वामन कहते हैं।
36.श्रीपर्वत- श्रीसुंदरी
कश्मीर के लद्दाख क्षेत्र के पर्वत पर माता के दाएँ
पैर की पायल गिरी थी। दूसरी मान्यता अनुसार
आंध्रप्रदेश के कुर्नूल जिले के श्रीशैलम स्थान पर
दक्षिण गुल्फ अर्थात दाएँ पैर की एड़ी गिरी थी।
इसकी शक्ति है श्रीसुंदरी और भैरव को सुंदरानंद कहते
हैं।
37.विभाष- कपालिनी
पश्चिम बंगाल के जिला पूर्वी मेदिनीपुर के पास
तामलुक स्थित विभाष स्थान पर माता की बायीं
एड़ी गिरी थी। इसकी शक्ति है कपालिनी
(भीमरूप) और भैरव को शर्वानंद कहते हैं।
38.प्रभास- चंद्रभागा
गुजरात के जूनागढ़ जिले में स्थित सोमनाथ मंदिर के
निकट वेरावल स्टेशन से 4 किमी प्रभास क्षेत्र में
माता का उदर गिरा था। इसकी शक्ति है
चंद्रभागा और भैरव को वक्रतुंड कहते हैं।
39.भैरवपर्वत- अवंती
मध्यप्रदेश के उज्जैन नगर में शिप्रा नदी के तट के पास
भैरव पर्वत पर माता के ओष्ठ गिरे थे। इसकी शक्ति है
अवंति और भैरव को लम्बकर्ण कहते हैं।
40.जनस्थान- भ्रामरी
महाराष्ट्र के नासिक नगर स्थित गोदावरी नदी
घाटी स्थित जनस्थान पर माता की ठोड़ी गिरी
थी। इसकी शक्ति है भ्रामरी और भैरव है विकृताक्ष।
41.सर्वशैल स्थान
आंध्रप्रदेश के राजामुंद्री क्षेत्र स्थित गोदावरी
नदी के तट पर कोटिलिंगेश्वर मंदिर के पास सर्वशैल
स्थान पर माता के वाम गंड (गाल) गिरे थे। इसकी
शक्ति है राकिनी और भैरव को वत्सनाभम कहते हैं’
42.गोदावरीतीर :
यहाँ माता के दक्षिण गंड गिरे थे। इसकी शक्ति है
विश्वेश्वरी और भैरव को दंडपाणि कहते हैं।
43.रत्नावली- कुमारी
बंगाल के हुगली जिले के खानाकुल-कृष्णानगर मार्ग
पर रत्नावली स्थित रत्नाकर नदी के तट पर माता
का दायाँ स्कंध गिरा था। इसकी शक्ति है कुमारी
और भैरव को शिव कहते हैं।
44.मिथिला- उमा (महादेवी)
भारत-नेपाल सीमा पर जनकपुर रेलवे स्टेशन के निकट
मिथिला में माता का बायाँ स्कंध गिरा था।
इसकी शक्ति है उमा और भैरव को महोदर कहते हैं।
45.नलहाटी- कालिका तारापीठ
पश्चिम बंगाल के वीरभूम जिले के नलहाटि स्टेशन के
निकट नलहाटी में माता के पैर की हड्डी गिरी थी।
इसकी शक्ति है कालिका देवी और भैरव को योगेश
कहते हैं।
46.कर्णाट- जयदुर्गा
कर्नाट (अज्ञात स्थान) में माता के दोनों कान
गिरे थे। इसकी शक्ति है जयदुर्गा और भैरव को अभिरु
कहते हैं।
47.वक्रेश्वर- महिषमर्दिनी
पश्चिम बंगाल के वीरभूम जिले के दुबराजपुर स्टेशन से
सात किमी दूर वक्रेश्वर में पापहर नदी के तट पर
माता का भ्रूमध्य (मन:) गिरा था। इसकी शक्ति है
महिषमर्दिनी और भैरव को वक्रनाथ कहते हैं।
48.यशोर- यशोरेश्वरी
बांग्लादेश के खुलना जिला के ईश्वरीपुर के यशोर
स्थान पर माता के हाथ और पैर गिरे (पाणिपद्म) थे।
इसकी शक्ति है यशोरेश्वरी और भैरव को चण्ड कहते
हैं।
49.अट्टाहास- फुल्लरा
पश्चिम बंगला के लाभपुर स्टेशन से दो किमी दूर
अट्टहास स्थान पर माता के ओष्ठ गिरे थे। इसकी
शक्ति है फुल्लरा और भैरव को विश्वेश कहते हैं।
50.नंदीपूर- नंदिनी
पश्चिम बंगाल के वीरभूम जिले के सैंथिया रेलवे स्टेशन
नंदीपुर स्थित चारदीवारी में बरगद के वृक्ष के समीप
माता का गले का हार गिरा था। इसकी शक्ति है
नंदिनी और भैरव को नंदिकेश्वर कहते हैं।
51.लंका- इंद्राक्षी
श्रीलंका में संभवत: त्रिंकोमाली में माता की
पायल गिरी थी (त्रिंकोमाली में प्रसिद्ध
त्रिकोणेश्वर मंदिर के निकट)। इसकी शक्ति है
इंद्राक्षी और भैरव को राक्षसेश्वर कहते हैं।
52.विराट- अंबिका
विराट (अज्ञात स्थान) में पैर की अँगुली गिरी थी।
इसकी शक्ति है अंबिका और भैरव को अमृत कहते हैं।
नोट : इसके अलावा पटना-गया के इलाके में कहीं
मगध शक्तिपीठ माना जाता है….
53. मगध- सर्वानन्दकरी
मगध में दाएँ पैर की जंघा गिरी थी। इसकी शक्ति है
सर्वानंदकरी और भैरव को व्योमकेश कहते हैं।